Saturday, September 09, 2006

अपनी बात

हिन्दी में लघुकथाएं एक विधा के रूप में प्रतिष्ठित हैं । कहानी को संक्षिप्त करके लिखी गई कहानी के लघु रुप को लघुकथा कहा गया है । लघुकथा का जन्म हितोपतेश पंचतंत्र से माना जाता है । हिन्दी के आरंभिक काल से इसका स्वरुप पं. माधव सप्रे का “एक टोकरी भर मिट्टी” एवं श्री पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जी की “झलमला” कहानी में मिलता है। हिन्दी में लघुकथा वरिष्ठ साहित्यकारों ने सृजित किया है । मेरी लघुकथाएं राष्ट्रीय स्तर के संकलनों में प्रकाशित हो चुकी हैं “रंग झांझर” लघुकथा संग्रह मेरा प्रथम संग्रह है । मेरी आठ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं यथा सतनाम के अनुयायी, सतनाम की दार्शनिक पृष्ठभूमि, मितान (कहानी संग्रह-छत्तीसगढ़ी), नगमत (कहानी संग्रह-हिन्दी), उढ़रिया (उपन्यास-छत्तीसगढ़ी), पछतावा(हिंदी), बबुल की छाँव(काव्य संग्रह-हिंदी), मोगरा के फूल (छत्तीसगढ़ी) एवं एक कहानी संग्रह प्रकाशनाधीन है ।

“रंग झांझर” लघुकथा संग्रह में बीस लघुकथाएं है जो कि विभिन्न भावों को प्रकट करती हैं । इसके माध्यम से समाज से समाज की रुढ़िवादी व्यवस्था को चोट की गई है। संग्रह की भूमिका लेखन का कार्य आदरणीय डॉ. विनय कुमार पाठक ने किया है । पाठक जी देश के जाने माने भाषाविद हैं । इससे लघु कधा संग्रह की महत्ता बढ़ गई है । मैं श्री पाठक जी का ह्रदय से आभारी हूँ । लघु कथा संग्रह से विद्वत जन एवं पाठकों को कुछ दे सका तो मेरी सफलता होगी । सहयोग की अपेक्षा के साथ।
इस कृति को अंतरजाल पर प्रतिष्ठित करने के लिए मैं तकनीकी परिश्रम करने वाले श्री जयप्रकाश मानस एवं मित्रवत् व्यवहार के धनी- वैभव प्रकाशन के प्रमुख-डॉ.सुधीर शर्मा, श्री गिरीश पंकज, श्री संतोष रंजन, श्री राम पटवा आदि का तहेदिले से आभार प्रकट करता हूँ ।

डॉ.जे.आर.सोनी
10 अक्टूबर, 2006
रायपुर, छत्तीसगढ़

परमाणु-बतौर लघुकथाएँ

डॉ.जे.आर.सोनी अखिल भारतीय स्तर की लघुकथा संकलनों में समादृत होकर अपनी पहचान बना चुके हैं । उनकी बीस लघुकथा का संग्रह “रंग झांझर” प्रस्तुत है । हिंदी के पाठकों के लिए यह शब्द अमानक भले हो लेकिन छत्तीसगढ़ी भाषा-भाषियों के लिए यह शब्द उनकी संस्कृति का अंग है । एक लघुकथा भी इस शीर्षक पर आधारित है । जिसे पढ़ने से शीर्षक की रहस्यमयता का आभास हो जाता है । छत्तीसगढ़ की संस्कृति और लोक जीवन का व्यापक प्रभाव डॉ.सोनी पर पड़ा है, अतः उक्त लघुकथा का ऐसा शीर्षक देना उनकी विवशता नहीं, विशिष्टता का संयोजन है ।

प्रस्तुत संग्रह में बीस लघुकथाएँ संकलित हैं जो विविध विषयों, भावों, विचारों, घटनाओं, प्रसंगों की पृष्ठभूमि में परमाणु-बतौर प्रतिष्ठित हैं । आज समय और क्षण के महत्व की दृष्टि से कथाओं का जो महत्व है, उससे संस्कारी पाठक सुपरिचित है । समयसासयिक होते हुए भी ये रचनाएँ कुछ सोचने-विचारने के लिए बाध्य करती हैं, युग का प्रतिनिधित्व करती हैं, आधुनिकता का आंकलन करती हैं ।

हिंदी में लघुकथाएँ साठोत्तर स्थलियों और समकालीन परिस्थितियों से उद्भुत एक घारा है जो युगीन संदर्भों और आधुनिक बोधों से व्युत्पन्न कथा के अनावश्यक विस्तार, अनपेक्षित तत्व-रुपों के प्रसार की प्रतिक्रिया-स्वरुप न केवल प्रस्तुत हुई वरन् अपने वैशिष्ट्य को अंगीकार करती हुई तथा विपरीतता-विद्रूपता,संक्षिप्तता रहस्यात्मकता,आंचलिकता, समसामयिकता, आधुनिकता के संषलिष्ट प्रमाण के कारण प्रतिष्ठित भी हुई ।

लघुकथाओं का बीज भले ही पंचतंत्र व हितोपदेश की कथाओं में देखा जाए लेकिन हिंदी के आरंभिक काल में इसका स्वरुप माधवराव सप्रे का “एक टोकरी भर मिट्टी” या बख्शी जी की “झलमला” कहानी में निहारा-परखा जा सकता है । जिस छत्तीसगढ़ प्रदेश में हिंदी लघुकथाएँ जनमीं वही से डॉ.जे.आर.सोनी का यह संग्रह ‘रंग-झांझर’ से उद्घाटित हुआ है । यद्यपि साठ के दशक के बाद लघुकथाओं के नये रुप में पाठक परिचित होने लगे थे तथापि इसके विधा के रुप में स्थापन बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों की देन है, यह स्पष्ट है । इन लघुकथाओं का आदि रुप लोककथाओं में मिलता है अतः संस्कार के रुप में संस्थित इस कच्चे माल को पक्का माल बनाकर भी हिन्दी लघुकथा समृध्दि पा सकती है यह संकेत भी लघुकथाओ के लिए अपेक्षित होगा । “रंग झांझर” अपनी बहुरंगी छवि से पाठकों के यदि कुछ दे सका तो उसकी यह अतिरिक्त उपलब्धि होगी । शुभकामनाओं सहित-


डॉ.विनय कुमार पाठक
14सितम्बर 2002
निदेशक,
प्रयास प्रकाशन
जे-62,अज्ञेय नगर,बिलासपुर


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चुनरी बनी तलवार


रविवार का दिन था। कमला अपने मामा के घर से दुर्ग रेल्वे स्टेशन पारा घुमने जा रही थी। कक्षा आठवीं की छात्र । उम्र चौदह वर्ष । अपने माता-पिता की अकेली संतान थी। वह अपनी सहेली राधा के साथ भिलाई सेक्टर-6से टेम्पो में पहिए के पास एक किनारे में बैठ गई । टेम्पो खचाखच भर गया था। भिलाई से दुर्ग रास्ते पर टेम्पो वाला रूक-रूककर सवारी उतारते-चढ़ाते जा रहा था। कमला अपनी सफेद रंग की नई चुनरी गले में लपेट रखी थी । वह अब राधा के संग बातों में मशगुल थी । टैम्पो तेज गति से दौड़ रही थी। चुनरी हवा में लहराते हुए पहिए में धीरे-धीरे फंसती चली जा रही थी जिसका कमला को भान नहीं थी। टैम्पो जैसे ही रेल्वे क्रासिंग पार किया कि कमला का गर्दन धड़ से अलग हो गया जैसे किसी ने तलवार काट डाला हो । शरीर से खून की फव्वारे फूट रहे थे । एकाएक इस हादसे से अन्य यात्रियों को कुछ समझ नहीं आया कि किसने खून किया ? टैम्पो किनारे जाकर खड़ी हो गई । ड्रायव्हर ने माथा पकड़ लिया कि यह क्या लफड़ा हो गया । सभी यात्रियों ने पास आकर देखा तो कमला गर्दन में जो चुनरी लपेटे थी वह चक्के में फंसी हुई थी। टेम्पो के रफ़्तार से एक ही झटके में चुनरी से गर्दन अलग हो गया था ।

माता-पिता की लाड़ली बिटिया विवाह से पहले बिदा हो गई । सभी मुहल्ले व नगरवासियों ने नम आँखों से कमला की अंतिम संस्कार कर पंचतत्व में विलीन कर बिदा कर दिया । कमला को क्या पता कि जिस चुनरी को बड़े शान से लपेट कर जा रही थी, वही एक दिन तलवार बनकर जान ले लेगी ।
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प्रस्तुतिः सृजन-सम्मान, छत्तीसगढ़


कंजूसी का कड़वा फल


प्रतिदिन की तरह आज भी संतोष कुमार “साधी बिजली की दुकान पर गोल बाजार” में बैठा रहा। वह अपने लड़कों को बिजनेश की गुर सिखाता रहा। बच्चे हाँ में सिर हिला रहे थे। दुकान की साख अच्छी जम गई थी। सांधी जी को डिप्टी कलेक्टरी से सेवानिवृत्त हुये पाँच वर्ष बीत चुके थे। वे इधऱ-उधऱ गप मारकर दिन बिताते थे। साधी जी जीवन भर मुफ्त का माल उड़ाते रहे । सेवानवृत्ति के बाद भी लुफ्त उठाते रहते थे । कभी किसी अधिकारी को फोन करके जीप गाड़ी मंगा लेते थे। अपनी ख़ुद की मारूति कार घर पर ही थी।
संध्या सात बजे सांधी जी अपने पुत्र सत्यप्रकाश को स्कूटर से घर छोड़ने को कहा । जब गांधी रोड के पास पहुँचे ही थे स्कूटर का एक टायर पंचर हो गया । सांधी जी वहीं खड़े होकर कोई पहचान गाड़ी वालों को देखने लगे उस दिन कोई नहीं मिले । उसी समय रामकृष्ण शर्मा, लूना से अपने घर दर्पण कालोनी जा रहे थे । सांधी जी ने आवाज दी शर्मा जी रुक गए ।

सांधी जी ने कहा हमें भी घर तक छोड़ दो । शर्मा जी ने मना किया कि लूना नहीं खींच पाएगा। सांधी जी ने पैसा बचाने के लिए लूना के पीछे में बैठ गया । भारी भरकम शरीर होने के कारण लूना ऊपर उठ जाती थी। शर्मा जी धीरे-धीरे चले रहे थे । रामकृष्ण मंदिर के पास गति अवरोधक को पार करने के लिए जैसे ही लूना को चढ़ाया, रोड ब्रेकर ऊँचा होने के कारण लूना के पहिया ऊपर उठ गया और पीछे बैठे सांधी जी धड़ाम से गिर पड़े । पैर टूट गया। शर्मा जी ने सांधी जी को उठाया । पैर के दर्द से कराह रहे थे । शर्मा जी पुनः लूना में बिठाकर घर छोड़कर चला गया । सांधी जी के पैर में सूजन आ गया। पत्नी सावित्री ने तपाक से कहा । अच्छा हुआ बहुत कंजूसी करते हो । दस रुपए आटो खर्च बचाने के लिए पैर तुड़वा आए अब पांच हजार रुए खर्च करो । सांधी जी के कंजूसी ने पांच माह तक बिस्तर पर पड़े रहने को पजबूर किया पैर अभी भी ठीक नहीं हुआ है । उपर से पत्नी सावित्री उन्हें कोसती रहती हैं, सो अलग ।
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प्रस्तुतिः सृजन-सम्मान, छत्तीसगढ़


मोहल्ला समिति


गाँव एवं नगर के मोहल्ले में नागरिक एक विकास समिति का गठन कर लेते हैं। पाँच पड़ोसी मिलकर समिति बना लेते हैं । रामकृष्ण पाण्डे स्वयं समिति का अध्यक्ष मानकर नेतागिरी करने लगते हैं । मुह्ल्ले के दस आदमी लेकर वही किसी के घर वैठकर सड़क, सड़क, नाली, डामरीकरण के प्रस्ताव पारित करते हैं । स्थानीय पार्षद, विधायक, सांसद निधि से राशि की मांग करते हैं । विधायक, सांसद महोदय मुह्ल्ले में आकर माला पहनकर सम्मान कराते हैं । डामरीकरण एवं नाली बनाने के लिये सांसद दो लाख रुपये एवं विधायक पाचास हजार देने की घोषणा करते हैं। रामकृष्ण पांडे वे साथी जय-जय कार करते हैं। रामकृष्ण पांडे चाय नाश्ते कराकर सांसद, विधायक को विदा करते हैं। रामकृष्ण सांसद ,विधायक के आने से एवं राशि स्वीकृत कराने से मोहल्ला में धाक जम जाती है। कोई भी काम हो पांडे जी ती फटे एड़ी में टांग अड़ाते रहते हैं।

रामकृष्ण पांडे ने सोचा क्यों न समिति का पंजीयन करा लिया जावें । ओम प्रकाश पाठक ने बताया कि अध्यक्ष महोदय इस मोहल्ले में पहले से समिति (पंजीयन) हैं जिसके अध्यक्ष रमेशचन्द्र खरे हैं। समिति में तय हुआ है कि खरे को हटाया जावे । नया चुनाव कराया जावे रामकृष्ण पांडे ने बीस सदस्यों की सदस्यता राशि खरे को दी। खरे ने स्पष्ट रूप से मना कर दिया कि मैं सदस्य नहीं बनाऊंगा क्योंकि आप लोग मुझे पद से हटाना चाहते हैं। कई बार रामकृष्ण व साथी ने अनुनय विनय किया । परन्तु खरे ने खरा-खरा कह दिया कि मैं आप लोगों को सदस्य नहीं बनाऊंगा । अपनी राशि ले जाओ रामकृष्ण पांडे स्वयं अध्यक्ष ने सभी मोहल्ले वासियों के सामने घोषणा किया कि निकम्मे अध्यक्ष को हटाया जाता है और आज से मैं स्वयं अध्यक्ष बन गया हूँ । जो भी समस्या और लोगों का है मैं निराकरण कराने का प्रयास करूँगा । रमेशचंद्र खरे ने कहा-सभी निर्णय कोर्ट में होगा । आप कोर्ट जाइये रामकृष्ण पांडे छोटा मुँह लिये न्यायालय की ओर चल दिये ।
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प्रस्तुतिः सृजन-सम्मान, छत्तीसगढ़


बंटवारा


जब कभी घर आंगन का बंटवारा होता है तो दो भाइयों के दिलों का बंटवारा भी हो जाता है। धन संपत्ति माता-पिता, भूमि, पेड़-पौधों, घर-द्वार, खलिहान, आंगन के दो टुकड़े और बीच में बने चूल्हे के भी दो टुकड़े हो जाते हैं । उस दिन नये चूल्हा बनाना पड़ता है इसलिये घर में भोजन नही बन पाता दिनभर भूखे पूरे परिवार को रहना पड़ता है राम एवं श्याम को भुगतना पड़ा । मान- सम्मान का बंटवारा होने से राम को बहुत मानसिक पीड़ा हुई।
तिरपन साल पहले पाकिस्तान भारत से अलग होकर नया देश बना था। राम के पिता भीष्मशाह ने दुख बहुत सहा था । भोपाल को अपना निवास बना लिये थे। परन्तु भाई बंटवारा से मन उदास-उदास रहता । श्यामशाह ने राजनीतिक पहुँच का फायदा उठाकर रामशाह का तबादला नये छत्तीसगढ़ राज्य के बंटवारे में करा दिया। रामशाह खुशी-शुशी तबादल में छत्तीसगढ़ चला गया। रामशाह को पिता जी के बताये भारत पाकिस्तान के के बंटवारे की याद हो आयी । गाँव के जमींदार बड़े रोबदार परिवार थे। यहाँ शरणार्थी बन गये थे। सरकार के रहमों करम पर जी रहे थे। पिताजी ने बड़े परिश्रम करके का धंधा शुरू किये थे। बड़े सफल रहे। हम भाई बहनों को पढ़ाया लिखाया, शादी विवाह किया और नौकरी पर लगाया । आज फिर राज्य के बंटवारे में हम दो भाई मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ में बंट गये हैं । चूल्हे के दो टुकड़े होने से बच गये । ऐसे मानसिक आघात लाखों परिवारों को झेलना पड़ रहा है।
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प्रस्तुतिः सृजन-सम्मान, छत्तीसगढ़


अंतिम इच्छा


प्रेम प्रकाश शर्मा जी प्रथम श्रेणी अधिकारी ग्वालियर के मोती महल में पदस्थ थे । सेवा निवृत्त के लिये चार वर्ष बाकी थे। दो वर्ष सरकार के मर्सी पर बढ़ गया था । शर्मा जी अपने काम ईमानदारी, लगन, मेहनत से समय से पूर्व कर देते थे। टेबल में कोई कागज नहीं रखते थे। जैसे चपरासी रामदीन टेबव में नस्तियों को रखता दस मिलट में सभी फाइलों का निराकरण कर देता था। शर्मा जी बत्तीस साल सेवा कर चुके थे। शे ष सेवा को अच्छे ढंग से बीत जाये यही प्रार्थना ईश्वर से करते हैं ।
शर्मा जी को मधुमेह की रोग हो गया था। समय ते अनुसार भोजन नाश्ता करते थे । खाना खाने से पूर्व नियमित रूप से गोलियाँ का सेवन तरते थे । प्रेम प्रकाश की पत्नी सुमित्र बहुत सेवा करती थी। बड़ी भली महिला थी। बच्चों की विवाह कर मातृ पितृ ऋण से मुक्त हो गये थे । शर्मा जी को बीमारी ने उम्र से पहले वृद्ध बना दिये थे। प्रातः सुबह उठकर पाँच मील पैदल चलते थे। इसलिये राजरोग अटेक नहीं कर पाते थे। सुमित्र प्रतिदिन टेबलेट खाने के लिये ध्यान रखती थी।

एक दिन शर्मा जी के राजरोग में थोड़ी सी वृद्धि हो गई । आफिस वे 6 बजे हांफते हुये आये। सुमित्र ने देखकर कहाँ क्या हो गया । जल्दी से प्रीज से एक बोतल ठंडा पानी निकालकर गिलास में दी एक सांस में पानी पी गया। शर्मा जी की पत्नी सुमित्रा से कहा कि मैं ज्यादा दिन नहीं जी पाऊंगा । मेरा शरीर खोखला हो गया है। मेरी अंतिम इच्छा है बच्चों को ठीक से रखना मेरा पेंशन लगभग साढ़े पाँच हजार रुपये माह बार एवं जमा राशि बीमा,जी.पी.एफ. ग्रेज्युटी राशि लगभग सात लाख रुपये मिल जायेंगे । तुम्हारा गुजारा चल जाएगा । सुमित्रा ने बोली कि तुम तो अपनी अंतिम इच्छा को बता दिये । मेरी अंतिम इच्छा है कि मैं आपसे पहले मरूं और मेरी मृत्यु हो तो मेरी लाश को अपने कंधे में लादकर मुक्ति धाम में क्रिया कर्म अपने हाथों से कर देना। मैं बहुत सुख भोग चुकी हूँ । मुझे जीवन में सब कुछ मिल चुका है। भारतीय नारी की अंतिम इच्छा होती है कि पति के हाथों में दाह संस्कार हो । यही मोक्ष मार्ग है । शर्मा जी सुमित्र के गले से लगा लिया । आँखों से आंसू बहने लगे । वाह भारतीय नारी तेरी जय हो तुम धन्य हो, महान हो ।
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तेरही भीज


शारदा बाल ग्राम की पहाड़ी पर मंद पवन के झोके पुरवाई सी बह रही थी। पूर्व में सूरज देव की लालिमा से मनोहारी दृश्य दिख रहा था। लाल गेंद के समान सूर्य उदय हो रहा था। पहाड़ी के ऊपर मैदान में घास के ऊपर बैठकर योगाभ्यास कर सभी सुबह भ्रमण करने वाले साथी श्री एस. पी. रिछारिया, डॉ. सुखदेव सक्सेना, डॉ. जयसिंह सोनी, ओमप्रकाश दुबे, आर. के गोयल, स्वरूप सिंह, श्री रामप्रसाद लिटोरिया, आर. के .शर्मा, जन्डेलसिंह तोमर गप्पे मारकर हँसी मजाक कर रहे थे । पंडित रिछारिया की खीर पूड़ी की तारीफ हो रही थी। बहुत बढ़िया खीर पूड़ी नही थी। छक कर खाये थे।

स्वरूप सिंह ने कहा कि आप लोग तो खीर खाये मेरी मुंह में पानी आ गया। मैं कल गोठ में विलंब से पहुँचा। पंडित रिछारिया के खीर को आसानी से नहीं पचा पाओगे । सभी लोग जोर से ठहाके लगाकर हँसे । हँसी से पहाड़ी गूंज उठी । सूरज की लालिमा से सभी के चिहरे चमक रही थी। स्वरूप सिंह ने बड़े भावुक होकर कहा डॉ. सक्सेना मैं सोचता हूँ कि अपनी तेरही भोज जीते जी करना चाहता हूँ । मेरी अंतिम इच्छा है। डॉ. सक्सेना ने सभी लोगों को अंतिम इच्छा सुनाई सभी लोगों ने बड़े आश्चर्य से सुना। पंडित रिछारिया ने कहा ठीक है डॉ. सक्सेना । हम लोग तेरही भोज खाने के लिये तैयार हैं। डॉ. सक्सेना स्वरूप सिंह जी की तिरही भोज का आमंत्रण सभी लोगों की ओर से स्वीकार कर लिया ।

प्रतिदिन सुबह बाल ग्राम के पहाड़ी में तेरही की चर्चा होने लगी । स्वरूप सिंह ने पेंशन राशी मिलने पर आठ तारीख को भोज देने के लिए तारीख निश्चित की गई । पहाड़ी के ऊपर गोल गोलम्बर में भोज की तैयारी चल रही थी। सभी साथी मिलकर पकाने के लिये सामग्री तैयार कर रहे थे। वीरेन्द्र कुमार जी ने दर्पण कालोनी से एक नाई पकड़कर ले आये । स्वरूप सिंह से कहाँ पहले सिर का बाल साफ कराकर मुडंन कराईये । सभी साथियों ने बारी-बारी से मुण्डन कराये । पास के टंकी में जाकर स्नान किये । सभी लोगों को पंडित रिछारिया ने गंगा जल छिड़ककर पवित्र किये । सभीलोगों ने मिलकर जीवित आत्मा की आत्मा की शांति के लिय सुन्दरकांड की पाठ किये । स्वरूप सिंह उस दिन गंभीर हो गये थे। भाव बिभोर होकर, ठहाके लगाकर हँस पड़े । उनके आँखों से आँसू झर-झर बहने लगे । बड़ा गमगीन स्थिति बन गई । कहाँ हँसी मजाक मनोरंजन हेतु कार्यक्रम रखा गया था। बड़े भावुक होकर स्वरूप सिंह जी बोले कि मेरे सुपुत्र नहीं हैं । आठ कन्याओं ने सेसे घर जन्म लिये । सात पुत्रियों का विवाह कर दिया हूँ । एक पुत्री बची है इसका भी विवाह मेरे दामाद लोग कर देंगे । इसके बाद मैं मर जाऊंगा । स्वयं जाने से पहले मैं तेरही भोज देना चाहता था। जो मेरी इच्छा आज पूरी हो रही है। गरीब बच्चों को माल पुआ, खीर लड्डू खिलाये गये । तेरह ब्रह्मणों को सबसे पहले भोज कराये । सभी लोगों को इक्यावन रुपये, एक गमछा देकर ब्रह्मणों का आशीर्वाद लिये । सभी लोग छक कर खाये । ओम का डकार लेते हुए पेट में हाथ फेरते हुये चले गये । बहुत दिन के बाद पंडित दीनानाथ के सुस्वाद भोजन मिला था।

इसके बाद सभी साथी एक साथ बैठकर पंगत में भोजन ग्रहण किये, जमकर आये । मालपुआ की खूब तारीफ किये । स्वरूप सिंह की चेहरे में चमक बढ़ गई थी। आभी पण्डल दमक रहाथा । स्वरूप सिंह ने कहा कि हमने परंपरा कोतोड़कर जीते जी अपनी तिरही कर डाली । स्वर्गीय होने से पूर्व अपनी आँखों के सामने तेरही भोज करा दिया । मेरी आत्मा को अपार शांति मिल रही है । रो – रोकर आस पड़ोश को इकट्ठा कर ली है । बड़ा तमाशा हो रहा हैं । सभी सुबह घूमने वालों को गाली दे रही हैं । सत्यानाश हो कह रही हैं । सभी लोग हतप्रभ रह गये । सभी महिलाओं को लेकर पहाड़ी की ओर आ रहे हैं। स्वरूप सिंह ने कहा-मित्रों डरने की बात नहीं है । मैं तो रोजाना डंडा खाता हूँ आज आप लोग भी खा लिजिये । डॉ. सक्सेना ने दूर जाकर देखा दस बारह महिलायें लाठी लिये पहाड़ी चढ़ रही हैं । सक्सेना नेकहा-भागो साथियों अपने-अपने सामान लेकर सभी पहाड़ियोंसे ओझल हो गये । सभीमित्रों को तेरही भोज की याद आते ही ठहाकों की गूंज से पहाड़ी गुंजायमान हो जाती है ।
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प्रस्तुतिः सृजन-सम्मान, छत्तीसगढ़


कोलिहा संघ ( लाफिंग क्लब)


छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की गर्मी विश्व प्रसिद्ध है । यहाँ की गर्मी, उपर से सड़कों की धूल मानव स्वास्थ्य को अधिक प्रभावित कर रहे हैं । यहाँ के नागरिक इससे निजात पाने के लिये उपाय ढूढ़ते हैं । अपने स्वास्थ्य के प्रति अधिक चिंतित हैं । रायपुर शहर में न बड़ी पार्क है, न बाग-बगीचा यहाँ जाकर टहला जा सके । सुन्दर नगर, रिंग रोड धमतरी, भिलाई मार्ग पर बसा हुआ है। जहाँ ते सेवा निवृत्त कर्मचारी, अध्कारियों ने गर्मी से राहत पाने के लिये सुबह 4.00 बजे से सड़को में घुमते-फिरते नजर आते हैं । श्री लक्ष्मण राव सप्रे सबसे अधिक आयु के व्यक्ति हैं । आठ दस के समूह में घूमने निकलते हैं । हँसी,मजाक, राजनीतिक, साहित्यिक चर्चा कर समय बिताने हैं । कुछ युवक अपना स्वास्थ्य ठीक करने के लिये पी. टी. एवं योगाभ्यास भी करते हैं ।


श्री माथनसाव ने दस बारह मित्रों को लेकर एक हंसोड़ संघ बना लिये हैं । जो सब मिलकर जोर-जोर से हँसते हैं । आस-पास के निवासी और सुबह घुमने वालों को पता चल जाता है कि हंसोड़ संघ वाले आ गये हैं । दिनों-दिन संघ की सदस्यों में वृद्धि हो रही थी। श्री सप्रे जी ने कहा-डॉक्टर साहब आप भी कोलिहा संघ का सदस्य क्यों नहीं बन जाते, मैंने कहाँ सप्रे जी जब आप अध्यक्ष बन जायेंगे तब मैं सदस्य अवश्य बन जाऊंगा । सभी सदस्य जोर-जोर से ठहाके लगाकर हंस पड़े कोलिहा संघ जिन्दाबाद के नारे लगने लगे । उधर से हंसोड़ संघ वाले हा-हा.....कर हँसने लगे ।


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मुहूर्त


पंडित विश्नाथ अपनी पत्नी रमा देवी को शूभ मुहूर्त , पंचाग ज्योतिष एवं अग शासत्र के बारे में समझ रहेथे । रमा देवी बड़े ध्यान से पंडित के बातों को सुन रही । थी, एक –एक करके सारी बातें समझा रहेथे। पंडित जी ने कहा कि कोई भी काम बिना शुभ मुहूर्त के नहीं करना चाहिए चाहे कितनी बड़ी से बड़ी विपत्ति अचानक क्यों न आ पड़े ।


एक रात जब पंडित और पंडिताईन गहरी नींद में रोये रहते हैं तभी आधी रात को चोर, पंडित के घर पिछले दरवाजे को तोड़कर घर में घुस जाता है । चोर घर का सारा सामान घर से बाहर निकालकर ले जाने के लिये बोरे में भरने लगता है, बर्तनों को भरते समय खनक –खनक की आवाज आवाज आने के कारण रमा देवी जाग जाती है और पंडित जी को जगाकर घर में चोर घुसने की बात कह चिल्लाने के लिये कहती है ताकि चोर सामान सहित पकड़ा जा सके । पंडित जी मना करते हुए पंडिताइन को घर के ए क कोने (जहाँ से रोशनी चोर न तक पहुँच सके) में लालटेन जलाने लिये कहकर पंचांग को स्वयं अंधेरे में ढूंढते हैं । पंचांग को रोशनी में अध्ययन करने पर ज्ञान हुआ कि मध्य रात्रि को होने वाले किसी भी अशूभ या अनहोनी घटना का उपचार तुरंत न कर सबह 10 बजे दिन में करना उचित होगा तभी चोरी या खोया हुआ सामान वापस आ सकता है । पंडित और पंडिताइन पुनः लालटेन को बुझाकर सो जाते हैं । चोर सभी सामान के एक-एक कर ले जाता है ।


सुबह मुहुर्त के अनुसार ठीक 10 बजे दिन में पंडित और पंडिताइन अपने घर से चिल्लाते हैं-चोर-चोर । चिल्लाने की आवाज सुनकर पूरे बस्ती के लोग डण्डा लेकर घर को चारों तरफ घेर लेते हैं ताकि चोर पकड़ा जा सके । काफी देर तक चोर के भागने का ,न ही निकलने का और न ही पंडित-पंडिताइन के चिल्लाने का पता चला । तब गाँव वाले पंडित जी के घर में घुसे, सिर्फ दोनों रोते हुए मिले । गाँव वाले पंडित जी से पूछे कि बाकया क्या है, पंडित ने रात्रि की सारी घटना बताई । परंतु चिल्लाने का शूभ मुहूर्त न होने के कारण चोर-चोर नही चिल्लाये,क्योंकि चिल्लाने का मुहूर्त दिन में 10 बजे था।
गाँव वालेसभी
पंडित-पंडिताइन के मूर्खता पर हंस रहे थे और नुकसान के लिये तरस आ रहे थे । चोर सभी मान लेकर चंपत हो गये थे।


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मधुमेह की गोली


रामदीन श्रीवास्तव और राधेश्याम शर्मा जवाहर गार्डन की बेंच पर बैठे-बैठे सुबह की ठंड़ी हवा का आनंद ले रहे थे । दोनों सयाने, दोनों ही मधुमेह रोग से वर्षों से ग्रसित।

शर्माजी ने बात शुरू करते हुए कहा, “आज आप बहुत खुश नजर आ रहे हैं ।”

“अरे शर्मा जी, डॉक्टर साहब ने सलाह दी है कि रोजाना खाने से पहले डायोनील व बी.पी. की एक-एक गोली खा लिया करो । उसके बाद कुछ भी खाते रहूँ, कुछ भी असर नहीं पड़नेवाला । मैंने ठीक वैसा ही किया-रात में पीटर स्कॉच और साथ में मुर्गा पेट भर आया और सो गया । सच बता रहा हूँ भाई, मजा आ गया । इसीलिए श्रीवास्तव जी, मेरा कहना मानिए और जीने का मजा लीजिए ।”- श्रीवास्तवजी ने चहकते हुए प्रसन्नता का राज बताया ।

दूसरे दिन सुबह श्रीवास्तव गार्डन में नहीं दिखे । शर्माजी को चिंता हुई कि आखिर हुआ क्या जो नियमित गार्डन आने वाले श्रीवास्तवजी आज नहीं पहुँचे । घर से पता चला कि वे तो नर्सिंग होम में भर्ती हैं ।
शर्मा जी अब सीधे नर्सिंग होम जा पहुँचे । श्रीवास्तव जी को इंसुलिन के इंजेक्शन लग रहे थे।

शर्मा जी ने ठहाका लगाते हुए पूछा, “क्या हुआ श्रीवास्तव जी...... ? कल तो बड़े खुश होकर बता रहे थे कि खाने के पहले एक-एक गोली खा लो और फिर कुछ भी खाते रहो........।”
श्रीवास्तव ने मुँह लटकाते हुए कहा, “शर्माजी इसी लालच में कल अधिक पी ली थी और मुर्गा भी आ गया था और आज अस्पताल में भर्ती हूँ ।………….”

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कलेक्टर ने भूत से कहा



कलेक्टर ने भूत से बात की, बड़ा अटपटा लगता है। कोई भी इस बात पर विश्वास नहीं करता । आज के वैज्ञानिक युग में भूत-प्रेतों को अंध-विश्वास कह कर मजाक उड़ाते हैं । भारत वर्ष में कभी-कभी ऐसी घटनायें घटती रहती हैं । समाचार पत्रों में पढ़ने को मिलता रहता है। सुनते हैं कि विदेशों में भी अपने मृत संबंधियों के आत्मा को आव्हान कर चर्चा करते हैं।

भिण्ड जिले के मेहगाँव तहसील में रायपुरा नामक गाँव हैं । जहाँ कप्तान सिंह गुर्जर अपने पाँच भाइयों के साथ निवास करते हैं । सबसे बड़े भाई का नाम कलेक्टरसिंह, दूसरे का नाम कप्तानसिंह, तीसरे का नाम तहसीलदारसिंह, चौथे का नाम थानेदारसिंह और सबसे छोटे का नाम हवलदार सिंह था । पिता मलखानसिंह और माता सूरजा देवी । मलखानसिंह जाने माने हुए कृषक थे । खेतों में सरसों, गेहूँ, बाजरा, चना, धनिया, मक्का, अरहर, तिली पैदा कर लेते थे । भरा-पूरा परिवार । लगभग सौ बिघा जमीन ।

मलखानसिंह तीन भाई थे सभी अलग-अलग गाँव में रहते थे । मोहरसिंह संतानहीन थे । इसलिये अपने भाई के लड़कों से ज्यादा ही लाड़-प्यार करते थे । वे बड़े ही धार्मिक प्रवृत्ति के इंसान थे । पूजापाठ में दिन बिताते थे ।

मोहरसिंह अपने मकान के सामने खेत में मंदिर बनवाना चाहते थे । परन्तु यह खेत किसी रसालसिंह का थे और मलखानसिंह और मोहरसिंह के बीच छत्तीस का आंकड़े था । हमेशा बँटवारे को लेकर लड़ाई होती रहती थी । गाँवों में लड़ाने-भिड़ने वालों की कोई कमी थो़डे न होती है ।

किसी भी समय बरसात होने वाली थी । मोहरसिंह मकान की छत को मरम्मत करने के लिये घर के ऊपर चढ़ा हुआ था । अचानक पैर फिसल जाने के कारण छत से सिरके बल गिर पड़ा और मर गया । पूरे परिवार के सदस्यों ने मिलकर दाह संस्कार किये एवं क्रिया कर्म तेरह दिन में तेरही आस पास के संबंधियों को खिलवाये । पंडित, नाई- धोबी को दान देकर क्रिया कर्म पूर्ण किये । मोहरसिंह की आत्मा भटक रही थी उनने जो मंदिर बनाने का संकल्प किया था पूरा नहीं हुआ था । भटकती आत्मा कौसे पूरा किया जाये ष मंदिर कौसे बने, हमेशा सोचते रहते थे । कप्तान समंह को एक दिन रात्रि में बताये कि- मैं मेरे घर के सामने खेत में मंदिर बनवाना चाहता था । रसालसिंह से जमीन खरिद कर मंदिर बनवा देना, नहीं तो मैं सभी घर द्वार, खलिहान में आग लगाकर नष्ट कर दूंगा । कप्तान सिंह पसीने-पसीने हो गया । सुबह से ये बात सभी भाइयों एवं बच्चों कोबताया सभी भोंचक रह गये । रात्रिवाली बात रसालसिंह को बतायी परन्तु उसने झूठे कहकर मजाक उड़ा दी । कप्तान सिंह बहुत परेशान हुआ । दूसरे दिन रात में कप्तान सिंह को पुनः उसने तारीख दी उसने रसाल सिंह की बात उसे बता दी । अतृप्त आत्मा बहुत नाराज हो गया और चेतावनी देकर चला गया।

कुछ दिन के बार रसाल सिंह के लड़कों ने सोचा । क्यों न वहाँ पर मकान बना दिया जैये ? नींव खोदकर खपरेल वाले मकान एक माह के भीतर में बनाकर खड़ा कर दिया । मोहरसिंह के अतृप्त आत्मा ने देखा तो आग बबूला हो गया । सबसे पहले बदला लेने सोचा । खलिहान में रखे गेहूँ-भूसा की ढेरी में अपने आप आग लग गया । लगभग पच्चीस हजार का नुकसान हो गया । रसालसिंह के लड़के जगमोहन सिंह ने आगजनी की रिपोर्ट थाने में दर्ज कहा दी । पटवारी ने तहसीलदार को आगजनी की रिपोर्ट भेजी । तहसीलदार श्री संतोषकुमार सांधी ने एस.सी.मिश्रा एवं कलेक्टर भिण्ड के पास उसकी जानकारी भेजी । एक सप्ताह के बाद, जो नये घर बनाये थे उसमें आधीरात को अचानक छत से आग का धुँआ निकलने एवं धू-धू कर जलने की आवाज आई । कप्तानसमंह एवं रसालसिंह परिवार मिलकर आग बुझाये जगमोहन सिंह थाने में आगजनी की अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ अफ. आई. आर. दर्ज कराये। गाँव में आग लगने की घटना से दहशत मच गया । गाँव में इस प्रकार की आग कभी नहीं लगी थी । पटवारी, कोटवार ने आग कीक्षति की जानकारी नायब तहसीलदार, तहसीलदार, अनुविभागीय अधिकारी, कलेक्टर भिण्ट को दिये । एक किसान के घर में दो बार आग लगने की गटना को कलेक्टर श्री एम. के. दीक्षित ने गंभीरता से लिया । श्री मिश्रा अनुविभागीय अधिकारी को फोन किया कि मैं मौका-मुआवजा करने गाँव जाऊँगा ।

दूसरे दिन कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक गाँव पहुँचे । श्री मिश्रा, एस.डी. एम. थानेदार मनमोहन दल बल के साथ गाँव रायपुरा कप्तानसिंह, रसालसिंह, जगमोहनसिंह कोटवार, पटवारी, पटेल सब गाँव वालों के समक्ष खलिहान में जले गेहूँ भूसा के ढेर एवं जले मकान को देख कलेक्टर एवं पुलिस अधीक्षक ने पूछताछ की । जगमोहन ने बताया कि किसी के ऊपर शक नहीं है । कप्तानसिंह ने कलेक्टर साहब को भूत की चेतावनी को बताया । कलेक्टर दीक्षित ने भूत की चतावनी को मजाक में उड़ा दिया और कहाँ कि मैं नहीं मानता । मोहरसिंह का भूत सुन रहा था । बहुत गुस्सा में कहाँ कलेक्टर साहब यहाँ पर मेरा शासन चलता है तुम्हारा भिण्ड में चलेगा । नहीं तो देख लो । रसालसिंह के दूसरे घर से आग की लपटें उठने लगी मकान धू-धू कर जलने लगा । वहाँ पर हाहाकार मचने लगा। पुलिस बल और गाँव वाले मिलकर आग बुझाने में लग गये। कप्तान सिंह ने कहा साहब भूत प्रेत में अदृश्य शक्ति होती है । कुछ भी कर सकते हैं । भूत ने जोर से ठहाका लगाया और कहा कलेक्टर साहब देख लो । यदि मेरी बात मान लेते हो सदा के लिये चला जाऊंगा । कलेक्टर साहब ने कहा भाई भूत जी माफ करना मैंने आपको समझ नहीं पाया । भूत ने कड़क आवाज में कहाँ कलेक्टर साबह जो घर रसालसिंह ने बनाये हैं वहाँ मैं हनुमान मंदिर बनावाना चाहता था परन्तु मेरी बात रसाल सिंह न नहीं मानी । कप्तान सिंह को मैं चेतावनी भी दीथी । उसने भी मेरी बात नहीं मानी । कलेक्टर पुलिस अधीक्षक एस.डी. एम. तहसीलदार सभी लोग सकते में आ गये । तहसीलदार क्षी संतोष कुमार सांघी जी ने अदृश्य आत्मा भूत के बारे में बताया । कहाँ साहब हम लोग यहाँ से चले नहीं तो कोई अनहोनी न हो जाये । जवाबदारी हम लोगों को हो जायेगी । सांधी जी कप्तानसिंह ने वैसे ही किया। भूत की आत्मा को थोड़ी शांति मिली । श्री सांधी ने रसालसिंह जगमोहन सिंह को कहाँ कि गाँव की भलाई एवं परिवार की भलाई चाहते हो तो, उस जगह पर मंदिर बनवा दो । वैसे भी तुम्हारा लाखों का नुकसान हो गया है । मैं कलेक्टर साहब से जले हुये घर भूसा का मुआवजा दिलवा दूंगा।
जले हुये मकान से कड़क आवाज आयी । कलेक्टर साहब यदि मेरी बात नहीं मानी गई तो पूरे गाँव को जला कर राख कर दूंगा । यद् आज नहीं सुनेंगे तो आपके कार में आग लगा दूंगा । वहां आतंक का वातावरण था। कलेक्टर पुलिस अधीक्षक जीवन में किसी भूत के चक्कर में फंसे थे । कलेक्टर पुलिस अधीक्षक ,एस. डी. एम. साघी जी सभी अपने ढंग से रसाल सिंह को समझाये । रसाल सिंह ने कपेतान सिंह को भूमि देने के लिए तैयार हो गये वहां पर भव्य मंदिर बनवाना । हम लोग उद्घाटन के दिन आयेंगे । रसाल सिंह ने घर से नारियल ,आगरबत्ती लाये । कलेक्टर साहब ने कहा भूत भाई रसाल सिंह मंदिर बनवाने के लए राजी हो गये हैं अब तो खुश हो जाओ । आकाश में जोर से अट्टहास हा...हा... कर हुआ । भूत ने कलेक्टर से कहा यद् यो लोग मंदिर बनवा देते हैं । तो मेरी आत्मा को शांति और संतुष्टि मिलेगी । मैं जीते जी मंदिर नहीं बनवा सका मेरी आत्मा भटक रही है । मैं भूत बनकर रहा गया हूँ । कलेक्टर साहब ने नारियल तोड़ कर अगरबत्ती जलाकर मंदिर का भूमि पूजन किया । गांव में रात के नौ बजे थे । सांधी तहसीलदार साहब ने जलपान की व्यवस्था हेतु कप्तान सिंह को कहा। गांव की सबा में कलेक्टर साहब ने विकास हेतु पचास हजार रुपये देने की घोषणा किये। जलपान ग्रहण कर मेहगांव के लिए प्रस्थान किये । सभी ग्रामीणों ने कलेक्टर साहब एवं अधिकारियों को भावभीनी बिदाई दी एवं धन्यवाद दिये ।
कप्तान सिंह, रसाल सिंह ने भव्य मंदिर का निर्माण कराया । मंदिर में प्रथम पूजा मोहर सिंह भूत ने किया उसके बाद सभी परिवार जनों ने किया । भव्य मंदिर में पूजाके बाद अदृश्य शक्ति,अदृश्य आत्मा का पता नहीं चला । गांव में सभी मंगल से रहने लगे ।

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कमरा नं. 20


रजनी बीए प्रारंभिक की छात्र थी और वह कॉलेज के छात्रवास के कमरा नं. 20 में रहती थी। रूम पार्टनर कुमारी अनुराधा बी. एस-सी. प्रथम वर्ष में पढ़ रही थी।

रजनी का छोटा भाई गाँव में 6 वीं में पढ़ रहा था। रजनी अपने छोटे भाई से बहुत प्यार करती थी। वह भी पिताजी के साथ हास्टल में आया-जाया करता था।

अचानक रजनी के पिताजी बीमार पड़ गये । उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया । घर में कोई न होने के कारण रामू को रजनी के साथ हॉस्टल में छोड़ दिया गया ।

उस दिन रजनी और अनुराधा भोजन करने मेस में चली गई थी । रामू अकेले कमरे में रह गया था । बाजू कमरे वाली लड़कियोँ को मौका मिला और वे रामू को बहला कर अपने कमरे में ले आईं ।

दोनों लड़कियों ने रामू से पुरूषोचित व्यवहार करने को कहा । रामू नादान था, रोने लगा । रामू के कपड़े उतार दिये गये एवं बारी-बारी से दोनों लड़कियों ने बलात्संग किया । रामू के जननेंद्रीय फट गया और खून बहने लगा । लड़कियाँ मारे डरकर भाग खड़ी हुईं । रामू रोता-चिल्लाता रहा ।

रजनी को पता चला तो वह काठ हो गई । भागती आयी और देखती है कि भाई बिस्तर में खून से लथपथ पड़ा रो रहा है, रजनी को सारा बाकया समझ में आ गया । किसी तरह रामू को तत्काल अस्पताल में भर्ती करवाकर इलाज करवाई । रजनी ने होस्टल वार्डन को जानकारी दी, वार्डन ने सभी लड़कियों को चेतावनी देकर छोड़ दिया । रामू भी किसी लड़की को पहचान न सका पर कमरा नं. 20 होस्टल के लिये स्थायी चर्चा का विषय बन गया ।
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हाथी वाले भीखमंगे


अक्सर गाँव एवं शहर की सड़कों तथा गलियों में भीख माँगने वाले हाथी में चढ़े हुए दीख जाते हैं । बिहार एवं उत्तरप्रदेश से किराये की हाथी लेकर छत्तीसगढ़ में भीख मांगने का काम करते हैं ।

रमेश ने अपने पिताजी से पूछा- “पिताजी, आज तक मैंने भीखमंगे को सायकल, कार, लूना, तिपहिया, पैदल चलते हुए, मंदिरों, मस्जिदों, गिरिजाघर, गुरुद्वारों एवं चौराहों पर बैठकर भीख माँगते हुए देखा है परन्तु हाथी पर चढ़कर भीख माँगना अच्म्भा लगा ।”
सुखदेव शर्मा ने रमेश को बताया, “बेटा ये तो हमारे देश का पुरातन धंधा है । आजकल भीखमंगो ने भी अपना एक संघ बना लिया है-“अंतराष्ट्रीय भीखमंगा / फकीर संघ”। हमारे देश के मंत्री लोग कटोरे लेकर विदेश जाते हैं । वे विकसित देशों से विकास ने नाम पर करोंड़ों रुपये के भीख मांगते हैं और पेपर में फोटो सहित छपवाते हैं कि उन्होंने देश के लिए ये किया वो किया.......

एक बार विदेश दौरे पर गया भारतीयों के एक दल ने विदेशियों से पूछा, “आपके शहर में कोई भीखमंगा नहीं दिख रहा ? हमारे देश में तो रेलवे स्टेशन, बस अड्डों, सड़कों और अन्य सार्वजनिक जगहों पर भीखमंगों की टोलियाँ दिख जायेंगी ।”

विदेशियों ने बताया, “वहाँ भीखमंगे नहीं मिलते । सिर्फ आप जैसे लोग यहाँ आकर धंधे की बातें करते हैं ।”

भारतीय दल के एक सदस्य ने बड़े गर्व से कहा, “सर, भूल रहे हैं, हमारे देश में प्राचीनकाल से हाथी में चढ़कर भीख मांगते आ रहे हैं । क्या ?
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मच्छरदानी




राहुल प्रातः 5 बजे अपने पिताजी के साथ घुमने के लिये जवाहर उद्यान जाता था। उद्यान से घुमकर जब वापस अपने घर आ रहे थे, मार्ग में तेलीबांधा तालाब पड़ता था।




रोजाना देखते थे कि तालाब किनारे पानी में मच्छरदानऀ कैसे टांगकर रखे हैं यह देख राहुल को बड़ा अटपटा लगता था इसलिये उत्सुकतावश प्रश्न किया कि पिताजी हम लोग घर में मच्छरदानी लगाकर सोते है । परंतु पानी में मच्छरदानी लगाकर कैसे सोते हैं और कौन सोते हैं ? हाहुल के पिताजी ने मजाक में कहा कि बेटे तालाब की मछलियाँ भी रात में मच्छरदानी लगाकर सोती हैं, ये देख लो । राहुल हँसने लगा हा-हा, क्या मछलियाँ भी मच्छरदानी लगाकर सोती हैं ? राहुल ने फिर पूछा पिताजी क्यों लगाते है मच्छरदानी । पिताजी ने बताया कि बेटा मछली के बच्चे बेचने वालों ने मच्छरदानी लगाये हैं । छोटी-छोटी मछलियों से लाखों का व्यापार करते हैं । इसी मच्छरदानी में पालकर रखते हैं । मछली पालन करने वालने कृषक इसे खरीदकर गाँव के तावाब, पोखर में डाल देते हैं । मछलियों के बड़ी होने पर जाल से निकालकर लाखों रुपये का लाभ कमाते हैं । राहुल आज भी मच्छरदानी देखकर हँस पड़ता है ।



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बाल खड़े होना


क्रोध आने पर आँखें लाल एवं शरीर के बाल खड़े हो जाते हैं । इससे पता चलता है कि आज अधिकारी बहुत नाराज हैं । सभी अधिकारी एवं कर्मचारी सिर झुकाकर अपने काम में लग जाते हैं । इसी तरह बड़े अधिकारी अपने अधीनस्थों को हमेशा बंदर घुड़कियाँ देते रहते हैं और सभी कर्मचारी आपस में बैठकर मजाक करते हैं कि आज तो साहब के बाल खड़े हो गये थे ।

रमेश को समझ नहीं आ रहा था -बाल खड़े होना । उसे यह बात खटक रही थी । दूसरे दिन अधिकारी बड़े गुस्से से आये और लगे अपनी कुर्सी को पटकने । वे बीच-बीच में टेबिल को ठोंककर चिल्लाये भी जा रहे थे कि कर्मचारी कामजोर, लापरवाह और भ्रष्ट हैं । समय पर आफिस नहीं आते । दिया गया काम समय पर नहीं करते । आज मैं छोडूँगा नहीं सबको निलंबित कर दूँगा । वे बारी-बारी से कर्मचारियों को बुलाकर डांटे भी जा रहे थे।

रमेश ने बड़े गौर से देखा कि अधिकारी के बाल क्रोध की गति के साथ खड़े हो रहे थे। वे क्रोध से कांप रहे थे और बाल के साथ स्वयं खड़े हो गये थे । रमेश आज पता चल गया था कि बाल खड़े होने का मतलब क्या होता है ।
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प्रस्तुतिः सृजन-सम्मान, छत्तीसगढ़

अमचूर


दीनानाथ शुक्ला नाम के हायर सेकेण्डरी स्कूल में प्राचार्य थे । पढाई-लिखाई से उन्हें कोई खास मतलब नहीं था । अंग्रेजी पढ़ाते समय शुक्ला जी अमचूर1 खाये व्यक्ति के समान चपर-चपर करते थे । देखकर सभी छात्रों को हंसी आ जाती थी । उन्हें लगता जैसे वे अमचूर खाकर आये हों । एक दिन कुछ शरारती छात्रों ने बोर्ड में ‘अमचूर’ लिख दिया । शुक्ला जी जब कक्षा में आये तो सभी छात्र ही-ही, ही-ही कर हँसने लगे । शुक्ला जी ने गुस्से में सभी छात्रों को डेस्क में खड़ाकर एक–एक छड़ी जमा दिया और भनभनाते हुए प्राचार्य-कक्ष में चले गये ।

यह स्टाफ रूम में भी प्राचार्य विरोधी शिक्षकों के लिए किसी किस्से से कम नहीं था । लगे चटकारे लेना । अब तो सारे स्कूल में अमचूर शब्द शिक्षकों और छात्रों के जुबां पर चढ़ आया । बात यहाँ तक जा पहुंची कि जिस मार्ग से शुक्ला जी आते थे वहाँ के सड़कों पर भी छात्रों ने चाक से अमचूर लिख दिया ।

प्राचार्य महोदय ने परेशान होकर अपना तबादला अमचूर नामक गाँव में ही करा लिया ।


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1 = अमचूर नाम लेने से मुंह में पानी आ जाता है । अमचूर यानी आम का खट्टे मीठा स्वाद जिसमें हल्दी, मिर्च, नमक भी ।


प्रस्तुतिः सृजन-सम्मान, छत्तीसगढ़

रंग–झांझर


बिलासा कला मंच बिलासपुर के भव्य सांस्कृतिक सम्मान समारोह में महामहिम राज्यपाल महोदय एवं मुख्यमंत्री के समक्ष मंच के सूत्रधार सोमनाथ यादव ने एनाउन्स किया कि लोक कला साधक, साहित्यकार एवं गीतकार श्री पी. आर. उरांव जी अपने प्रसिद्ध पलाकारों के साथ रंग –झांझर प्रस्तुर करेंगे । रंगझांझर यानी विभिन्न रसों की संगीतमय प्रस्तुति । भोजली, सुवा, करमा, ददिरया, डण्डा, नाचा-गम्मत और आधुनिक पाप डांस सब कुछ ।

कार्यक्रम शुरु हुआ । जैसे ही मंच में छैल छबीला बने श्री उरांव जी आये और माईक पर गाना शुरू किया कि सभी दर्शक झूम उठे । हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा । एक से बढकर एक बढिया कार्यक्रम प्रस्तुत किये । मंच में रंग-बिरंगी पोशाकों में मादर की थाप, घुंघरूओं की झनक से नृत्यांगना थिरक रही थीं । करमा –ददरिया समूह नृत्य मे मंच हिल रहा था । हजारों दर्शकों ने तालियों की गड़गड़ाहट से उत्साहवर्धन किया । मुख्य अतिथि महोदय ने बाजू वाले से पूछा, “यह कौन सा कार्यक्रम था ? कार्यक्रम बहुत अच्छा लगा, मजा आ गया ।” बाजू वाले ने बताया, “सर, उरांव जी द्वारा प्रस्तुत कार्यक्रम रंगझांझर था। मुख्य अतिथि ने फिर से पूछ, “भई रंगझांझर का अर्थ क्या होता है ?”
बगल वाले ने बताया कि विभिन्न रंगों की बहार ।
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डाँट




एक बड़े अधिकारी हमेशा अपने अधीनस्थ अधिकारी-कर्मचारियों को बात-बात में डांटा करते थे, चाहे गलती हो या न हो । इसका असर पूरे विभाग पर इस तरह पड़ता था कि काम समय से पहले हो जाता था ।

एक दिन बड़े अधिकारी ने छोटे अधिकारी को उनके निवास पर फोन से डांट दिया कि तत्काल अभी आफिस आओ और काम करके दिखाओ । पत्नी सब सुन रही थी । पत्नी के सामने डांट खाने पर बहुत बुरा लगा ।

वे भनभनाते हुये आफिस जा पहुंचे । बंद होने को आ गया था । कुर्सी में बैठने से पहले कुर्सी को जोर से धक्का मारकर पटका और जोर जोर से चिल्लाने लगे-

“आप लोग कोई काम नहीं करते, डांट मुझको खानी पड़ती है । 20 साल की नौकरी में आज पहली बार साहब से डांट खानी पड़ी, वह भी पत्नी के सामने ।“

अपने मातहत अधिकारियों पर एक-एककर गुस्सा उतारने के बाद घंटी पर भी अपनी गुस्सा उतार दिये । घंटी पी-पी कर बजने लगी । चपरासी सामने आकर खड़ा हो गया । चपरासी समझ गया कि साहब क्रोध में है, शीघ्र ही ठंडा पानी लेकर आया और टेबल पर रख कर चला गया ।
डांट का चक्रीय सिलसिला कुछ इस तरह चला कि बड़े अधिकारी ने छोटे अधिकारी को डांटा, छोटे अधिकारी ने कर्मचारी को, कर्मचारी ने चपरासी को और चपरासी ने डांट का असर तीन कांच के गिलास को पटक कर किया, तब जाकर कहीं डांट का यह क्रम बंद हुआ ।

बड़े अधिकारी ने क्रोध शांत होने के बाद सभी छोटे अधिकारियों को अपने कमरे में बुलाया और चाय पीते-पीते बताये कि घर में पत्नी डांट रही थी, उसी समय बास ने फोन पर डांट दिया उसका असर आप लोगों पर उतर गया । सभी अधिकारियों ने खींसे निपोरते हुए कहा, “कोई बात नहीं सर चलता है ।“


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प्रस्तुतिः सृजन-सम्मान, छत्तीसगढ़



सूक्ष्म शिल्पकारी


रसिकबिहारी अवधिया रायपुर के जाने माने शिल्पकार हैं । इनकी मिट्टी की कलाकृतियों की कई प्रदर्शनी देश के बड़े-बड़े शहरों में लग चुकी हैं । दर्शक दंग रह जाते हैं कि ये इतनी सूक्ष्म महीन छोटी गणेश की प्रतिमा कैसे बना लेते हैं ? इसी तरह गणेश की दर्जन भर ऐसी मूर्तियाँ जिसे सूक्ष्मदर्शी यंत्र से ही देखी जा सकती थी उसे दर्शक बारी बारी से अवलोकन कर प्रशंसा कर रहे थे ।

रमेश ने कहा, “लगता है यह दुनिया की सबसे छोटी मूर्ति है ।“

रसिक बिहारी ने कहा कि आपने चावल के दाने में राम-राम और कृष्ण-कृष्ण आदि लिखते हुए देखा है परंतु यह काम उन सबसे अलग हटकर है।

दर्शकों के बीच बहस छिढ़ गयी कि कौन-सी मूर्ति सबसे छोटी है ? रमेश ने अखबार में छपी उस खबर का वास्ता देकर बताया कि सबसे छोटी गणेश की प्रतिमा रामलखन बालोदवाले ने बनायी है ।

बहस को विराम देते हुए मैंने दोनों को समझाया कि आज के युग में अणु एवं परामाणु के बराबर भी मूर्ति शिल्प बनाने का दावा कर सकते हैं । सच तो यह है कि इस प्रतिस्पर्धी दौर में हर शिल्पकार अपनी-अपनी कृति को अपने ढंग से अलग-अलग अर्थों में समझाता है ।

रसिक बिहारी इस विवाद में न पड़ कर रमेश को अपनी सूक्ष्म कलाकारी का गूढ़ अर्थ बताया और अगले प्रदर्शनी की तैयारी में जुट गया ।
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रामअधीर ने कहा, “बेटा यदि सिफारिश कर अपने पिताजी को अध्यक्ष बना भी देगा तो क्या फायदा, ये तो कलयुग में ही होगा ?

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